धान की फसल में बालियाँ निकलने की अवस्था, महत्वपूर्ण है उचित फसल प्रबंधन: एनआईबीएसएम

रायपुर, 25 सितंबर 2026

छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों में धान की फसल बालियाँ निकलने की प्रारंभिक अवस्था एवं प्रजनन अवस्था में पहुंच गई है। यह फसल की अत्यंत महत्वपूर्ण अवस्था है, जिसमें बालियों का विकास, दाना बनने और अंतिम उपज पर सीधा प्रभाव पड़ता है। वर्तमान में हो रही बारिश एवं अधिक आर्द्रता को देखते हुए राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, रायपुर ने किसानों को खेतों की नियमित निगरानी बढ़ाने तथा कीट एवं रोगों की स्थिति के अनुसार वैज्ञानिक एवं अनुशंसित प्रबंधन उपाय अपनाने की सलाह दी है।
बालियाँ निकलने की प्रारंभिक अवस्था में धान का पौधा वानस्पतिक वृद्धि से प्रजनन अवस्था की ओर बढ़ता है और पौधे के ऊपरी हिस्से में बालियों का विकास शुरू होता है। इस दौरान खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना आवश्यक है। वहीं, जिन खेतों में पानी का जमाव हो रहा है, वहां उचित जल निकासी सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है।
संस्थान के निदेशक डॉ. पी. के. राय ने कहा, “धान की फसल में बालियाँ निकलने की अवस्था फसल प्रबंधन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस अवधि में किया गया उचित प्रबंधन बालियों के विकास, दाना बनने और उपज को सीधे प्रभावित करता है। किसानों को संतुलित पोषण, पर्याप्त नमी और नियमित खेत निगरानी पर ध्यान देना चाहिए तथा बिना आवश्यकता कृषि रसायनों के प्रयोग से बचना चाहिए।
प्रजनन अवस्था में किसानों को तना छेदक एवं ब्राउन प्लांट हॉपर (भूरा माहू) की विशेष निगरानी करनी चाहिए। तना छेदक के प्रकोप से सफेद बालियाँ (व्हाइट ईयर हेड) बन सकती हैं, जबकि ब्राउन प्लांट हॉपर पौधे के निचले हिस्से से रस चूसकर गोलाकार रूप में फसल के सूखने की स्थिति पैदा कर सकता है, जिसे “हॉपर बर्न” कहा जाता है। नियमित निगरानी तथा आवश्यकता के अनुसार फेरोमोन ट्रैप का उपयोग प्रारंभिक पहचान में सहायक हो सकता है।
संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने रोगों की प्रारंभिक पहचान पर जोर देते हुए कहा, “लगातार अधिक आर्द्रता और घनी फसल की स्थिति में शीथ ब्लाइट एवं ब्लास्ट जैसे रोग तेजी से फैल सकते हैं। रोग के लक्षणों की समय पर पहचान और आवश्यकता के अनुसार उचित प्रबंधन से संभावित उपज हानि को कम किया जा सकता है।” शीथ ब्लाइट में पत्ती के आवरण पर अंडाकार या अनियमित धब्बे दिखाई देते हैं, जबकि ब्लास्ट रोग पत्तियों, गांठों एवं कॉलर को प्रभावित कर आगे चलकर गर्दन और बालियों तक पहुंच सकता है। किसानों को रोग की सही पहचान के बाद ही आवश्यकतानुसार अनुशंसित फफूंदनाशकों का प्रयोग करना चाहिए।
संस्थान के वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि अनुशंसित कीटनाशकों एवं फफूंदनाशकों का ही उपयोग निर्धारित मात्रा और स्वीकृत लेबल निर्देशों के अनुसार करें। नाइट्रोजन की अत्यधिक मात्रा, अनावश्यक कीटनाशक मिश्रण तथा एक ही रसायन के बार-बार प्रयोग से बचना चाहिए। इस महत्वपूर्ण अवस्था में नियमित फसल निगरानी, संतुलित पोषण, उचित जल प्रबंधन तथा समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन अपनाकर धान की फसल की सुरक्षा और बेहतर उपज सुनिश्चित की जा सकती है।



