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’सफलता की नई इबारत’ : ’ड्रिप सिंचाई और सब्जी उत्पादन से चमकी नारायणपुर के वासुदेव की किस्मत’

रायपुर, 19 जुलाई 2026

धान के पारंपरिक खेती के चक्र से बाहर निकलकर वैज्ञानिक पद्धति से बैंगन और लौकी की खेती करने पर उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि होती है और गुणवत्तापूर्ण फलों के कारण शुद्ध लाभ में कई गुना बढ़ोतरी होती है। इसके लिए उन्नत किस्मों का चयन, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और एकीकृत कीट प्रबंधन का प्रयोग किया जाता है।आधुनिक तकनीकी से खेती करने पर किसान 3 से 5 लाख रुपये प्रति एकड़ तक का शुद्ध लाभ आसानी से कमा सकते हैं।

पारंपरिक खेती की जगह जब आधुनिक तकनीक और उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन का संगम हुआ, तो बस्तर के एक छोटे से गाँव नेतानार के किसान वासुदेव शिवलाल के जीवन में खुशहाली की नई फसल लहलहा उठी।

’पारंपरिक ढर्रे से हटकर चुनी नई राह’

नारायणपुर विकासखंड के सुदूर ग्राम नेतानार के रहने वाले किसान वासुदेव शिवलाल भी कभी आम किसानों की तरह सिर्फ पारंपरिक धान की खेती पर निर्भर थे। कड़ी मेहनत के बाद भी साल में सिर्फ एक फसल मिल पाती थी, जिससे परिवार की आर्थिक जरूरतें बमुश्किल पूरी होती थीं। आमदनी सीमित थी और भविष्य को लेकर चिंताएं बनी रहती थीं। लेकिन वासुदेव के भीतर कुछ नया करने और आगे बढ़ने का जज्बा था।

’उद्यानिकी विभाग का मिला साथ, बदल गई दिशा’

वासुदेव के जीवन में असली यू-टर्न तब आया जब वे जिला उद्यानिकी विभाग के संपर्क में आए। विभाग के अधिकारियों ने उन्हें धान के पारंपरिक चक्र से बाहर निकलकर नगदी फसल (सब्जी उत्पादन) की ओर रुख करने और पानी की कमी से निपटने के लिए आधुनिक ड्रिप सिंचाई प्रणाली (टपक सिंचाई) अपनाने की सलाह दी। तकनीकी बारीकियों को समझने के बाद वासुदेव ने जोखिम उठाया और अपने 1 हेक्टेयर खेत की सूरत बदलने का फैसला किया।

’कम पानी में बंपर पैदावार’

उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन में वासुदेव ने अपने खेत में वैज्ञानिक पद्धति से बैंगन और लौकी की खेती शुरू की। ड्रिप सिंचाई प्रणाली ने जादुई असर दिखाया। पौधों की जड़ों तक सीधे पानी और पोषक तत्व पहुँचने से पानी की भारी बचत हुई और खरपतवार की समस्या कम हो गई। वैज्ञानिक देखरेख के कारण बैंगन और लौकी की चमक, आकार और गुणवत्ता बाजार के अनुकूल रही। आधुनिक तकनीक के चलते मजदूरी और दवाओं का खर्च घटा, जबकि प्रति एकड़ उत्पादन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई।

’बदली माली हालत, खेती बनी भरोसेमंद आय का जरिया’

आज वासुदेव के खेत की ताजी सब्जियां नारायणपुर के स्थानीय बाजारों के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों में भी हाथों-हाथ बिक रही हैं। जहाँ पहले वे साल में एक बार होने वाली धान की फसल पर निर्भर थे, वहीं अब सब्जी उत्पादन से उन्हें हर हफ्ते और नियमित आय मिल रही है। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत हो चुकी है कि वे न सिर्फ अपने परिवार की हर जरूरत को पूरा कर रहे हैं, बल्कि भविष्य के लिए बचत भी कर रहे हैं। खेती अब उनके लिए घाटे का सौदा नहीं, बल्कि एक मुनाफे का व्यवसाय बन चुकी है।

’क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए बने श्रोल मॉडलश्’

नेतानार गाँव में वासुदेव के हरे-भरे खेत और उनकी आर्थिक समृद्धि को देखकर क्षेत्र के अन्य आदिवासी और स्थानीय किसान भी बेहद प्रभावित हैं। अब आसपास के दर्जनों किसान पारंपरिक खेती छोड़ आधुनिक कृषि तकनीकों, वैज्ञानिक पद्धतियों और सब्जी उत्पादन को अपनाने के लिए आगे आ रहे हैं।

वासुदेव शिवलाल की यह सफलता इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि सही सरकारी मार्गदर्शन, ड्रिप सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीक और किसान की कड़ी मेहनत का समन्वय हो जाए, तो छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल की खेती को भी बेहद लाभकारी और समृद्ध बनाया जा सकता है। वासुदेव की यह कहानी प्रदेश के लाखों किसानों को श्समृद्ध किसान, समृद्ध राज्यश् के सपने को सच करने की प्रेरणा देती है।

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