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एक फैसला, छोटी शुरुआत और बदल गई तकदीर

स्व-सहायता समूह से जुड़कर श्रीमती दिलमति बनीं सफल उद्यमी, आज हैं 'लखपति दीदी'

सुअर पालन, कृषि और आधुनिक तकनीक से हर वर्ष 7 से 10 लाख रुपये की आय, कई परिवारों के लिए बनीं प्रेरणा

रायपुर, 09 जुलाई 2026

स्व-सहायता समूह से जुड़कर श्रीमती दिलमति बनीं सफल उद्यमी, आज हैं 'लखपति दीदी'

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्व-सहायता समूहों के माध्यम से आजीविका के नए अवसर उपलब्ध करा रही है। महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण ही विकसित और आत्मनिर्भर छत्तीसगढ़ की मजबूत नींव है। राज्यभर में स्व-सहायता समूहों से जुड़कर हजारों महिलाएं स्वरोजगार अपनाते हुए “लखपति दीदी” बनने की दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल कर रही हैं।

इसी कड़ी में बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के जनपद पंचायत शंकरगढ़ अंतर्गत ग्राम पंचायत लडुवा की रहने वाली श्रीमती दिलमति आज ग्रामीण महिला उद्यमिता की प्रेरणादायक मिसाल बन गई हैं। कभी सीमित आय और आर्थिक अभाव से जूझने वाला उनका परिवार आज सुअर पालन, कृषि, जैविक सब्जी उत्पादन और कृषि आधारित गतिविधियों के माध्यम से प्रतिवर्ष 7 से 10 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रहा है। उनकी यह सफलता एक छोटे से निर्णय मां दुर्गा महिला स्व-सहायता समूह से जुड़ने से शुरू हुई।

कुछ वर्ष पहले तक खेती से होने वाली सीमित आय से परिवार का गुजारा मुश्किल था। ऐसे समय में श्रीमती दिलमति ने स्व-सहायता समूह की सदस्यता लेकर नियमित बचत शुरू की और समूह की बैठकों में भाग लेने लगीं। बैठकों में पीआरपी दीदियों एवं विभागीय अधिकारियों से उन्हें स्वरोजगार के विभिन्न अवसरों की जानकारी मिली। इसी दौरान उन्होंने सुअर पालन को आजीविका का माध्यम बनाने का निर्णय लिया।

समूह के माध्यम से उन्हें एक लाख रुपये का ऋण मिला। इस राशि से उन्होंने लगभग 40 हजार रुपये खर्च कर झारखंड से 10 सुअर खरीदकर व्यवसाय शुरू किया। शुरुआती चुनौतियों के बावजूद उन्होंने मेहनत और धैर्य नहीं छोड़ा। धीरे-धीरे उनका व्यवसाय बढ़ता गया। वर्तमान में उनके पास 9 मादा सुअर हैं। एक मादा सुअर से एक बार में 9 से 10 बच्चे प्राप्त होते हैं और प्रत्येक बच्चे की बिक्री लगभग 5 हजार रुपये तक होती है। इससे उन्हें नियमित रूप से लाखों रुपये की अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है।

श्रीमती दिलमति ने अपनी आय का उपयोग केवल घरेलू जरूरतों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने सुअर पालन के लिए आधुनिक शेड का निर्माण कराया, धान एवं मक्का कुटाई मशीन खरीदी तथा ड्रिप सिंचाई प्रणाली अपनाकर जैविक सब्जी उत्पादन शुरू किया। इससे उनकी आय के कई स्थायी स्रोत विकसित हुए और उनका परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर बन गया।

श्रीमती दिलमति की सफलता का प्रभाव पूरे गांव में देखने को मिला। उनकी प्रेरणा से ग्राम पंचायत लडुवा के 10 से 15 परिवारों ने भी सुअर पालन को अपनी आजीविका का माध्यम बनाया और आज वे भी अच्छी आय अर्जित कर रहे हैं। एक महिला की सफलता ने पूरे गांव में स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की नई सोच को जन्म दिया है।

श्रीमती दिलमति का कहना है कि स्व-सहायता समूह ने उन्हें केवल ऋण ही नहीं दिया, बल्कि आत्मविश्वास, प्रशिक्षण और आगे बढ़ने का अवसर भी दिया। वे अन्य महिलाओं से भी समूहों से जुड़ने, नियमित बचत करने और ऋण का उपयोग आय बढ़ाने वाले कार्यों में करने की अपील करती हैं। उनका मानना है कि जब महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होंगी, तभी परिवार, गांव और राज्य का समग्र विकास संभव होगा।

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